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शनिवार, 25 फ़रवरी 2017

यकजहती -वक़्त कि ज़रुरत

   
     जहरीली शहर की फिजायें  हो गई
                                         इंसानियत है सिसकती हर तरफ ,
                                         आदमी से ज्यादा गाये हो गई
हमारा हिंदुस्तान कभी यकजहती का गैह्वारा समझा जाता था। पूरी दुनिया हिन्दू मुस्लिम एकता कि दुहाई दिया करती थी
लेकिन फिर न जाने चमन को किसकी हवा लग गई कि चमन में इन्तशार फ़ैल गया। लोगों के मतभेद मन भेद में बदलने लगे।
जरा जरा सी बात लोग एक दुसरे से भिड़ने को तैयार बैठे है। वह लोग जो कल तक अंग्रेजो को काटने के लिये गाये दिया करते थे। उन्हें बकरे में भी बीफ नज़र आने लगा। वह लोग जो मजार पर कव्वालिया बजाय करते थे उन्हें संगीत में दिक्कत होने लगी।
जबकि इस देश कि परम्परा यह रही है कि बिस्मिल्लाह खान कांशी विश्वनाथ मंदिर में शहनाई बजाया करते थ। जब आजान होती थी तो मंदिर कि घंटियाँ रुक जाती थी जबकि आज,चाहे पुरे दिन बजे या न बजे लेकिन आजान के वक्त जरूर बजनी है।
ये आदर्श हमारे न थे.हमारे पूर्वजो ने हमे यह तालीम न दी थी।

गाँधीजी का मानना था कि अगर हम खुदा को सिर्फ अपने ज़ेहन से नहीं बल्कि दिल और जान से मानते हैं तो हम सम्पूर्ण मानवजाति से बगैर किसी धार्मिक, जातीय एवं वर्गीय भेदभाव के प्रेम करेंगे। मैंने कभी अपने परिचितों, अपरिचितों, देशवासियों, परदेसियों, गोरों और कालों, किसी भी धर्म के मानने वालों चाहे वे हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, पारसी, यहूदी हों, किसी के साथ भी भेदभाव नहीं किया है। मैं यह कह सकता हूँ कि मेरे भीतर इस भेदभाव को क़ायम रखने की क्षमता नहीं है।


 गाँधीजी का वास्तविक सपना दिलों को बदलना था, शक्ति से हालात को बदलकर वक़्ती फ़ायदा उठाना नहीं था। वह मानवीय समुदाय में नैतिक रूप से सन्तुलन पैदा करना चाहते थे। वह एक ऐसा हार बनाना चाहते थे जिसका हर दाना एक दूसरे से जुड़ा हुआ हो। उनका उद्देश्य था कि एक इंसान दूसरे इंसान के काम आये। वे एक दूसरे के पूरक बन जाएँ। जिसके पास जो कुछ है वह उसमें से दूसरों को भी दे ताकि सभी साधन-सम्पन्न हो जाएँ

इसलिए हमे आपस में पयार मुहब्बत में मिलजुल कर रहना चाहिए। ऐसे कामो से बचना चाहिए जो हमारी यकजहती को नुकसान पहुन्चाते होइस देश का असली मुद्दा मंदिर मस्जिद नहीं है।  इस देश का असली मुद्दा गाय नहीं है। इस देश का असली मुद्दा गरीबी है,अशिक्षा है,भूक प्यास से मर रही गाये है, अहले सियासत कि भड़की आग से जल रहा अमन का  मंदिर है। हमे गाँधी जी के आदर्शो पर चलते हुए देश कि अखंडता, को बनाये रखना होगा नहीं तो हमारा हाल यही होया कि बक़ोल  इकबाल-
न समझोगे तो मिट जाओगे ए हिन्दोस्तां वालो
तुम्हारी दास्ताँ तक भी न होगी दास्तानों में।





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