जामिया मिल्लिया इस्लामिया अपने शुरूआती दौर से ही यकजहती कि मिसाल रहा है। इसकी स्थापना असहयोग आन्दोलन की एक कड़ी रूप में हुई. इसका उद्देश्य राष्टीयताको बढ़ावा देकर विद्यार्थियों में वह आत्मविश्वास जगाना था जिसके बल पर वे निर्भय होकर उन क्षेत्रों में जाने का साहस कर सकें जहां दूसरे जाने से भयभीत होते हैं। एक दूसरे के धर्म का आदर करना इसका बुनियादी उसूल रहा है ।
और जामिया को इन सब उसूलो कि प्रेरणा मिलती है ,जामिया के संस्थापकों शैख़ उल हिंद मोलाना महमूद उल हसन , मौलाना मोहम्मद अली जौहर,हुसैन अहमद मदनी, हकीम अजमल से।
हकीम अजमल खां साहब ने जामिया के बारे में कहा था कि जहां हमने एक ओर सच्चे मुसलमान पैदा करने की कोशिश की, वहीं देश सेवा की भावना भी जागृत की। यहां इस बात का ख़्याल रखा गया है कि हिन्दू छात्र इस्लामियात को जानें तथा मुस्लिम छात्र हिन्दू रीति-रिवाज से नावाकिफ़ न रहें। और ये सिलसिला अभी तक चला आ रहा है। आज भी जामिया में इस्लामियात,हिन्दू धर्म शास्त्र, एक एच्छिक पेपर के रूप में अनिवार्य है.
जामिया के संस्थापक खुदसर्व धर्म समभाव कि मिसाल रहें है। शैखुल हिन्द ने जब अंग्रेजो से लड़ाई के लिए तहरीक रेशमी रुमाल की शुरुआत की थी तो उन्होंने अंतरिम सरकार का प्रधानमंत्री राजा महेंद्र प्रताप को बनाया.एकता और सद्भाव कि इससे बड़ी मिसाल कहाँ मिलेगी। जामिया पहले वाइस चांसलर मौलाना मोहम्मद अली जौहर ख़िलाफ़त आन्दोलन के नेता थे. खिलाफत आन्दोलन को आजादी कि लड़ाई में हिन्दू मुस्लिम एकता का प्रीतक माना जाता है ।
अपने संस्थापको के इन्ही आदर्शो पर चल कर जामिया ने सद्भावना ऐसी मिसाल पेश की है जिसे देश का अन्य कोई भी विश्वविद्यालय पेश कर पाने में असमर्थ है। जामिया ने एक ही समय में उर्दू विभाग का अध्यक्ष प्रो गोपीचंद नारंग को और हिंदी विभाग का अध्यक्ष प्रो मुजीब बैग को बना कर,साम्प्रदायिक तत्वों के उस दुष्प्रचार को नाकाम कर दिया कि उर्दू मुस्लमानो और हिन्दी हिन्दुओ की जबान है।
जामिया मिल्लिया इस्लामिया शांति पूर्ण ,धार्मिक सहअस्तित्व की मिसाल रहा है। जामिया ने इस्लामिक शैली अपनाने के बावजूद हमेशा तमाम धर्मों, जैसे बौद्ध धर्म, जैन धर्म, संशयवाद, नास्तिकता को स्थान दिया है और उन्हें एक दूसरे के साथ कई तरह से प्रतिस्पर्धा करके सबको आत्मसात कर अपने आप को उस रूप में ढाला है जिसे आज सेकुलरिज्म कहा जाता है।आज हिन्दुस्तान का शायद ही कोई ऐसा सूबा हो जिसके नौजवान तालिबिल्म (छात्र) यहाँ मौजूद न हों।’ जामिया शिक्षा, साहित्य और संस्कृति की संगम-स्थली बन चुकी है।
धर्मनिरपेक्षता जामिया कि विरासत का हिस्सा है और जामिया का उद्देश्य धर्म, जाति और क्षेत्र से ऊपर उठ कर उन वैचारिक आदर्शों पर आधारित भारत का निर्माण करना है। जिनकी परिकल्पना हमारे स्वतंत्रता सैनानियों, संस्थापको और हमारे संविधान निर्माताओं ने की थी।



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