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रविवार, 26 मार्च 2017

भाई चारे की मिसाल देते स्कूल और मदरसे..



भारत मे अनेक धर्म है जिसे एक सूत्र मे पिरोने का काम देश ने किया है। कही हनुमान मंदिर मे ईरानी औरते नमाज पड़ती देखी गई जिसे वही के पुजारी और फूल बेचने वालेने नमाज के लिए जगह उपलब्ध कराई। तो कई ऐसे मुस्लिम समुदाय के लोग भी है जो गणेश चतुर्थी के मौके पर बड़चड़ कर हिस्सा लेते है। देश मे कई ऐसे हिन्दू भी हैजो रोजा रखते है,तो कई मुस्लिम भागवत गीता का पाठ करते है। यह वाकई एकमिसाल है जो भारत देश के अलावा किसी और देश मे दिखाई नही देती। दुनिया में धर्म के नाम पर एक-दूसरे को लड़ाने वालों के लिए यह बात एक सबक देती  है कि धर्मकभी लड़ना नहीं सिखताबल्कि जोड़ता है। 
ऐसे ही, एक मदरसे में  गायत्री मंत्रो के साथ सोलह संस्कारोकी शिक्षा दी जाती है। लोगों को लगता है कि मदरसों सिर्फ मुस्लिम धर्म की शिक्षा दीजाती हैमगर मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले के मदरसे  ने इस धारणा को झुठलाया  हैं।इस जिले में कुल 220 मदरसे हैंउनमें से 128 मदरसे ऐसे हैं जहां मुस्लिम के साथहिंदू संप्रदाय के बच्चे भी पढ़ते हैं और इन मदरसों में हिंदू धर्म की धार्मिक शिक्षा दी जाती है। 
मदरसों की खास बात ये है कि हिंदू के साथ मुस्लिम बच्चों को भी संस्कृत श्लोक औरमंत्र याद हो गए हैं। यहां धर्म के नाम पर कोई भेदभाव नहीं है। इस तरह जिले के 128मदरसे हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक बन गए हैं। इन मदरसों में कक्षाओं की शुरुआतगायत्री मंत्र से होती है।
मदरसे हमेशा धर्म निरपेक्षता के प्रतीक रहे हैं। देश के मदरसों में राजा राममोहन रायऔर राजेंद प्रसाद जैसे महान लोगों ने शिक्षा हासिल की थी और आज भी हिंदू बच्चेइन मदरसों में पढ़ने आते है।

उन्नाव के मदरसा नियाजुल उलूम निस्वा और दारुल उलूम जियाउल इस्लाम ने समाज में हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल पैदा की है। इन दोनों मदरसों में कुल 800 बच्चे पढ़ने आते हैं। इनमें 10 फीसदी बच्चे हिंदू परिवारों से हैं। मदरसा शिक्षा परिषद यूपी के तहत आने वाले इन मदरसो में बच्चो को अरबी, फारसी और नमाज के अलावा हिंदी, इंग्लिश, मैथ्स, समाजशास्त्र और कंप्यूटर भी पढ़ाया जाता है। आधुनिकिरण में भी ये मदरसे किसी कॉन्वेंट स्कूल से कम नहीं हैं। यहां छोटे बच्चों को ब्लैकबोर्ड के साथ-साथ डिजिटल बोर्ड पर भी शिक्षा दी जाती है।

इन मदरसों के संस्थापक मोहम्मद जाकउल्लाह के मुताबिक, उन्होंने साल 2000 में एक किराए के मकान में पांच बच्चो को पढ़ाने की इसकी शुरुआत की थी। तीन महीने के अंदर ही उनके पास बच्चों की संख्या करीब 25 के आसपास हो गई। उसमें 15 मुस्मिल समुदाय के बच्चे और 10 करीब हिंदू बच्चे थे। 2005 तक उन्होंने उसी किराए के मकान में बच्चों को पढ़ाया। 2006 में उन्होंने शुक्लागंज के चम्पापुर मोहल्ले में दारुल उलूम ज़ियाउल इस्लाम मदरसे की नींव रखी। यहां 2 साल के अंदर ही करीब 200 बच्चे तालीम हासिल करने आने लगे, जिसमें करीब 40 बच्चे हिंदू थे।

यहां पढ़ने वाले बच्चे हिंदू और मुस्लिम दोनों परिवारों के हैं। वो यहां एक साथ बैठकर तालीम हासिल करते हैं। यही नहीं, यहां पढ़ाने वाले आधे से ज्यादा टीचर्स भी हिंदू ही हैं। ये मदरसे समाज और देश को आपसी भाईचारे का एक मुकम्मल संदेश दे रहे हैं। इतना ही नहीं, इन मदरसों में बच्चों को संस्कृत भी पढ़ाई जाती है।


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