हिंदुस्तान में सभी धर्मों के लोगों के साथ मिलजुल कर रहने की परंपरा बड़ी पुरानी है जो भी कोई समुदाय इस धरती पर आया यही का होकर रह गया ।आर्यों ने हिंदुस्तान पर आक्रमण किया जीतने के बाद वापस जाने के बजाये यहीं रह गए। तुर्की आए वह भी यही आकर बस गए, अफगानी आए तो वह भी यही रुक गये।मुग़ल आए तो यही के होकर रह गये नस्ल खतम होगई पर मुग़ल अमर हो गए। आज मुगलों के बगैर हिन्दुस्तान का इतिहास अधूरा है। और इस तरह हिंदुस्तान में एक नई तहजीब औरसभ्यता का विकास हुआ।लेकिन जब अँगरेज़ आये तो तो उन्होंने फूट डालो राज करो की निति अपनाई और हिंदुस्तान की उस तहजीब जो कि हजारो साल में पनपी थी,तहस नहस कर दिया। और जब हिन्दुस्तान छोड़ा तो देश को विभाजन का नासूर दिया,जिससे हिंदुस्तान का तानाबाना बिगड़ गया। और ऐसा बिगड़ा आज तक नहीं सुधर पाया। आज आजादी के 70 साल बाद भी भारत हिंदू मुस्लिम के बीच की खाई को खत्म नहीं कर पाया है। आज भी हमें अपने आसपास ऐसे लोग मिल जाएंगे जो कि देश की सबसे बड़ी अल्पसंख्यक आबादी के खिलाफ जहर उगलते हैं। भारत में आमतौर पर सिर्फ मुसलमानों को ही विभाजन का जिम्मेदार समझा जाता है। जबकि हकीकत यह है कि विभाजन के लिए हिंदू नेता और मुसलमान नेता दोनों ही बराबर के जिम्मेदार थे। और विभाजन का सबसे ज्यादा नुकसान मुस्लिम आबादी को ही हुआ था। लेकिन हिंदुस्तान पर रुक जाने वाले मुसलमानों को आज तक इस बटवारे की कीमत चुकानी पड़ रही है। कोई भी राह चलता सड़क छाप मांग कर देता है कि देशभक्ति के सर्टिफिकेट दिखाईये। हालांकि उसके पास अपने देश भक्ति का का कोई प्रमाण,नही बाप दादा अंग्रेजो के मुखबिर थे। और ओलाद दावा कर रही देशभक्ति के ठेकेदार होने का। ऐसे लोगों से मैं अक्सर यह पूछा करता हूं, भाई आप दिखाइए कि आपके पास देशभक्ति का क्या सबूत है। और मेरे बाप दादा के पास पाकिस्तान जाने का का आप्शन था लेकिन नहीं गए। हम बाई चांस नहीं, बाईचॉइस मुसलमान है। और यही हमारी देशभक्ति का सबसे बड़ा सबूत है कि हमने सब कुछ गवां दिया लेकिन देश छोड़कर जाना गवारा नहीं किया। जब कि आपके पास देशभक्ति का कोई सबूत नहीं, आपके पास गुंडागर्दी है। आपके पास आपके पास राष्ट्रवाद के नाम पर एक लठतन्त्र है। आपके पास अपनी देश भक्ति साबित करने का एक तरीका है। वह है दुसरे पर सवाल उठाना, कि सामने वाला आपने बचाव में आपसे सवाल न करे।
सदका ए दमान ए वतन किस ने दिया है
तामीर हसीं ताजमहल किस ने किया है
ये लाल किला हम ने दिया हमने दिया है
शाहीद हैं हमारे कहीं मस्जिद कहीं मीनार
और
हमे गद्द्दार कहते हो तुम्हे कुछ शर्म आती है
हमारे दम से कायम मुल्क में है जश्ने आज़ादी
हमारे खून से रंगी है हर सु बज्म ए आज़ादी


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