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खोज नतीजे

शनिवार, 1 अप्रैल 2017

प्रतीक्षा

 मैं अच्छे दिनों का इंतजार करता रहा
 कि अच्छे दिन आएंगे
 मैं इंतजार करता रहा 
लोग मरते रहे 
मैं इंतजार करता रहा
 कि मेरा प्रधान सेवक
 देश को हिंसा से बचा लेगा 
पर वह तो हत्यारों की मां का बेटा था
 असम से हत्या का सिलसिला से चला
 नहीं उससे भी पहले दाभोलकर को भी 
उन्होंने मारा था 
मुझे लगा कि यह नंगा नाच 
अब रुक जाएगा 
अखलाक  की शहादत आख़री होगी 
अब मेरा प्रधान सेवक जाग जाएगा
 रोक लेगा  अपने भाइयों को 
पर यह क्या उसने कहा ताऊ की सुनो मेरी नहीं
 यानी अब तक उसका समर्थन था भाइयों को
 हत्या रुकी  नहीं और बढ़ गई
 बेकसों पर  जुल्म ढाया गया 
मासूमों को भी जिंदा जलाया गया
 जो प्रतिरोध में किसी ने की इनाम वापसी 
उसे कांग्रेस से पुकारा गया
 देश का माहौल बिगड़ा हुआ
 चल रही है हर तरफ तशद्दुद  की हवा
में फिर  भी अच्छे दिन का इंतजार करता रहा
 है कि अच्छे दिन आएंगे
 मैं इंतजार करता रहा भ्रष्टाचार मुक्त भारत
 आतंकवाद मुक्त भारत महंगाई  मुक्त भारत
 काले धन की वापसी और अच्छे दिन 
सब चुनावी जुमले थे 
हवाई वादे  थे 
 मेरा प्रधानमंत्री ऐसा नेता है 
 जिसे अपनों से ज्यादा ओरों घर 
सुख  देता है 
मेरा  प्रधानमंत्री जब देश में दिखाई देता है
 तो जनता जान लेती है कि देश में हो रहे हैं चुनाव 
या फिर हो रही है मन की बात
 रेडियो पर 
राजा के लिए देश का महत्व नहीं है
 उसकी रूचि  इसमें है कि
 विदेशों में क्या हो रहा है 
अपने देश में तबाही हो रही है
 और वह भी विदेश का रोना रोरहा है 
उसकी निंद्रा टूटने कि सीमा अलग-अलग है 
घटना जितनी दूर होगी (देश कि सीमा से )
उतनी ही जल्दी देगा वह प्रतिकिर्या 
देश कि घटनाओं का 
नहीं होता उस पर कोई प्रभाव 
बल्कि 
बढ़ जाती है सीमा मोंन व्रत कि
 हाँ जब वह फस जाता है मतवालों में
 यानी शोषितों के पाले मे 
निकल आते हैं घडियाली आसू
 छा जाती है उसकी करूणा अखबारों में 
उनके विपक्ष में विश्व विद्यालय हैं
वह छात्रों के अधिकारों के मुखालिफ है
 इसलिए छात्र उनके मुखालिफ है 
उनको   उनको छात्रों से बेहतर तवायफ नजर आती है
 क्योंकि  छात्राएं डटी रहती है 
 लाठियों और पानी  के  बीच 
मैदानों में 

बुधवार, 29 मार्च 2017

साम्प्रदायिकता का निवारण


साम्प्रदायिकता देश के लिए बड़ी चुनौती बन चुकी है।  साम्प्रदायिकता से देश की स्वतंत्राता के लिए बहुत बड़ा संकट है। साम्प्रदायिकता की महामारी विकराल एवं भयावह है  इसका निदान बहुत जरूरी है। इसके निदान के लिए हमें उन कारणों को  खोजना चाहिए जिससे यह पैदा हुई  और इसके फैलने की जो वजह हैं उन्हें  रोकना चाहिए। साम्प्रदायिक तत्व अफवाहों के जरिये माहोल बिगड़ते हैं। साम्प्रदायिकता के खिलाफ धर्म निरपेक्षता एक कारगर प्रयास है इसलिए हमें धर्मनिरपेक्षता को बढावा देना चाहिए। साम्प्रदायिकतावाद परम्परावाद की जड़ से निकलता है। परम्पराओं के  मोह ने साम्प्रदायिकता को जन्म दिया है। हालाँकि यह बात  सही है कि परम्परा में ऐसे जीवन तत्व भी हैं जो सामाजिक चेतना के अंग हैं पर इन परम्पराओं को इतना स्वार्थपरक बना दिया गया है कि इनसे अहित अधिक होता है और हित कम। इसलिए परम्परा का पीछा करना अब औचित्यहीन रह गया है।
साम्प्रदायिकता से देश विभाजन का खतरा है। साम्प्रदायिकता के जहर ने सम्पूर्ण देश को विषाक्त बना डाला है। हमें यह जानना बहुत आवश्यक है कि वे कौन सी परिस्थितियां हैं जिससे साम्प्रदायिकता का विषवृक्ष पल्लवित हुआ। हमें इन परिस्थितियों के अध्ययन के बाद उन्हीं संदर्भों में इसका निदान खोजना चाहिए।
यह सच है कि यहां में मुगलों से पूर्व शक, हूण, कुशान के आक्रांता आये थे जिन्होंने देश के धन को भरपूर लूटा, सामूहिक कत्लेआम किये और स्त्री-पुरुषों को दास दासियां बना कर ले गये जहां उनमें से पुरुष का मूल्य 5 रुपया और स्त्री का मूल्य 10 रुपया लगा कर चौराहों पर नीलाम कर दिया गया। ये आक्रांता आये और चले गये थे। जब मुगल भारत में आये तो वे वापस नहीं गये। यह घोर निकृष्ट सोच है कि भारत का हिन्दू शक और हूणों को विदेशी और आक्रांता नहीं कहता है और न आर्यों को ही जिन्होंने 60 हजार अनार्यों का कत्लेआम किया था। शक, हूण, कुषान तीनों ही बाहरी हत्यारे आक्रांता थे पर वे भारत में बस गये। इन आक्रांताओं और मुगलों में क्या अंतर है फिर मुगलों को आक्रांता कहना कितनी बेइमानी की बात है। सच बात तो यह है कि मुगलों ने तो कोई कत्लेआम भी नहीं किया। अकबर ने तो सर्वधर्म समभाव की भावना से प्रेरित होकर दीन ए इलाही चलाया था। औरंगजेब जिस प्रकार बदनाम किया जाता है वह घृणा भाव के कारण बदनाम किया जाता है वरना अनेक हिन्दू उसके दरबार में उच्च पदों पर थे। अनेक मंदिरों के लिए उसने शाही खजाने से धन दिया था। उसे 'जजिया कर' के लिए बदनाम किया जाता है पर जजिया तो उसने मुसलमानों पर भी लगाया था। औरंगजेब ने कोई मंदिर नहीं तुड़वाया बल्कि अनेक उदाहरण ऐसे भी मिल जायेंगे जहां स्वयं हिन्दू राजाओं द्वारा मंदिरों को ध्वस्त कराया गया था। कश्मीर के राजा हर्ष ने तो अनेक मूर्तियों को तुड़वाया था। मौर्य शासकों ने तो तमाम हिन्दू मूर्तियों को पिघला कर सिक्कों के लिए धातु इकट्ठी करायी थी।
खोजने पर नये तथ्य प्रकट हुए हैं कि भारत का इतिहास अंग्रेजों ने कम और हिन्दू लेखकों ने अधिक झूठे तथ्य घुसेड़ कर साम्प्रदायिक बनाया है और मुसलमानों के प्रति विषवमन किया है। विशम्भर नाथ पांडे पूर्व राज्यपाल उड़ीसा ने लिखा कि वे जब टीपू सुल्तान पर शोध कर रहे थे तो एक छात्रा के पास पुस्तक देखी, जिसमें लिखा था कि टीपू सुल्तान ने तीन हजार ब्राह्मणों को बलात इस्लाम धर्म कुबूल करने को विवश किया था और तीन हजार ब्राह्मणों ने आत्महत्या कर ली थी। यह लेख एक हिन्दू लेखक पंडित हरप्रसाद शास्त्री का लिखा हुआ था। विशम्भर दयाल पांडे ने पं. हर प्रसाद से लिख कर पूछा कि यह कहां पर लिखा है तो हर प्रसाद ने कहा कि यह मैसूर के गजट में लिखा है पर गजट देखा गया, तो गजट में यह तथ्य कहीं नहीं पाया गया। इस प्रकार हिन्दू लेखकों ने मुसलमान बादशाहों के बारे में वैमनश्यतावश बहुत कुछ झूठ लिखा है। यही औरंगजेब के बारे में भी है। टीपू के बारे में तो यह प्रसिद्ध है कि उसका सेनापति ब्राह्मण था, वह 150 मंदिरों को प्रतिवर्ष अनुदान देता था, और श्रृंगेरी के जगतगुरु को बहुत मान्यता देता था। इससे साबित होता है कि इतिहास जानबूझ कर अंग्रेज लेखकों ने नहीं हिन्दू लेखकों ने ही झूठ लिखा है।
स्वतंत्रता के बाद यह सोचा गया था कि अब इस प्रकार का वातावरण तैयार किया जायगा जिससे देश में साम्प्रदायिकता की आग को ठंडा किया जायगा, किन्तु दुर्भाग्य है कि भारत की सरकार ने पिछले 60 साल में साम्प्रदायिक सौहार्द को बनाने के बजाय इसकी खाई को अधिक चौड़ा ही किया है। संविधान में भी स्पष्ट लिखा गया है कि किसी भी धार्मिक संगठन को सांस्कृतिक और शैक्षणिक कार्यों के अतिरिक्त किसी भी प्रकार साम्प्रदायिकता उभारने की अनुमति नहीं दी जायगी। पर हम बराबर देख रहे हैं कि साम्प्रदायिकता बराबर उभारी गयी है और संविधान को भी ताक में रख दिया गया है। कांग्रेस ने सत्ता में रहते हुए भी केरल और पंजाब में खूब धार्मिक नाटक खेले। आज तो धर्म के नाम पर ही नेतागीरी चमक रही है। धर्म के नाम पर राजनैतिक नेता यात्रायें निकाल रहे हैं। आज विभिन्न धार्मिक सम्प्रदायों में कटुता पैदा करके राजनीति चलायी जा रही है। अतः आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीति के हर नापाक गठबंधन को रोका जाय। साम्प्रदायिकता राष्ट्र प्रजातंत्रा और समाज की दुश्मन है इससे बचा जाय। धर्म की राजनीति करने वाले चाहे वे व्यक्ति हों, चाहे संगठन इन पर रोक लगायी जाय और इनका दमन किया जाय।

             आजादी कि जंग लड़ी है ,हिन्दू मुस्लिम दोनों ने
अपने मुल्क को खून दिया है,हिन्दू मुस्लिम दोनों ने
इस धरती पर जन्म लिया है,हिन्दू मुस्लिम दोनों ने

दोनों मिल कर देश बचाओ,सबका हिंदुस्तान है  

रविवार, 26 मार्च 2017

भाई चारे की मिसाल देते स्कूल और मदरसे..



भारत मे अनेक धर्म है जिसे एक सूत्र मे पिरोने का काम देश ने किया है। कही हनुमान मंदिर मे ईरानी औरते नमाज पड़ती देखी गई जिसे वही के पुजारी और फूल बेचने वालेने नमाज के लिए जगह उपलब्ध कराई। तो कई ऐसे मुस्लिम समुदाय के लोग भी है जो गणेश चतुर्थी के मौके पर बड़चड़ कर हिस्सा लेते है। देश मे कई ऐसे हिन्दू भी हैजो रोजा रखते है,तो कई मुस्लिम भागवत गीता का पाठ करते है। यह वाकई एकमिसाल है जो भारत देश के अलावा किसी और देश मे दिखाई नही देती। दुनिया में धर्म के नाम पर एक-दूसरे को लड़ाने वालों के लिए यह बात एक सबक देती  है कि धर्मकभी लड़ना नहीं सिखताबल्कि जोड़ता है। 
ऐसे ही, एक मदरसे में  गायत्री मंत्रो के साथ सोलह संस्कारोकी शिक्षा दी जाती है। लोगों को लगता है कि मदरसों सिर्फ मुस्लिम धर्म की शिक्षा दीजाती हैमगर मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले के मदरसे  ने इस धारणा को झुठलाया  हैं।इस जिले में कुल 220 मदरसे हैंउनमें से 128 मदरसे ऐसे हैं जहां मुस्लिम के साथहिंदू संप्रदाय के बच्चे भी पढ़ते हैं और इन मदरसों में हिंदू धर्म की धार्मिक शिक्षा दी जाती है। 
मदरसों की खास बात ये है कि हिंदू के साथ मुस्लिम बच्चों को भी संस्कृत श्लोक औरमंत्र याद हो गए हैं। यहां धर्म के नाम पर कोई भेदभाव नहीं है। इस तरह जिले के 128मदरसे हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक बन गए हैं। इन मदरसों में कक्षाओं की शुरुआतगायत्री मंत्र से होती है।
मदरसे हमेशा धर्म निरपेक्षता के प्रतीक रहे हैं। देश के मदरसों में राजा राममोहन रायऔर राजेंद प्रसाद जैसे महान लोगों ने शिक्षा हासिल की थी और आज भी हिंदू बच्चेइन मदरसों में पढ़ने आते है।

उन्नाव के मदरसा नियाजुल उलूम निस्वा और दारुल उलूम जियाउल इस्लाम ने समाज में हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल पैदा की है। इन दोनों मदरसों में कुल 800 बच्चे पढ़ने आते हैं। इनमें 10 फीसदी बच्चे हिंदू परिवारों से हैं। मदरसा शिक्षा परिषद यूपी के तहत आने वाले इन मदरसो में बच्चो को अरबी, फारसी और नमाज के अलावा हिंदी, इंग्लिश, मैथ्स, समाजशास्त्र और कंप्यूटर भी पढ़ाया जाता है। आधुनिकिरण में भी ये मदरसे किसी कॉन्वेंट स्कूल से कम नहीं हैं। यहां छोटे बच्चों को ब्लैकबोर्ड के साथ-साथ डिजिटल बोर्ड पर भी शिक्षा दी जाती है।

इन मदरसों के संस्थापक मोहम्मद जाकउल्लाह के मुताबिक, उन्होंने साल 2000 में एक किराए के मकान में पांच बच्चो को पढ़ाने की इसकी शुरुआत की थी। तीन महीने के अंदर ही उनके पास बच्चों की संख्या करीब 25 के आसपास हो गई। उसमें 15 मुस्मिल समुदाय के बच्चे और 10 करीब हिंदू बच्चे थे। 2005 तक उन्होंने उसी किराए के मकान में बच्चों को पढ़ाया। 2006 में उन्होंने शुक्लागंज के चम्पापुर मोहल्ले में दारुल उलूम ज़ियाउल इस्लाम मदरसे की नींव रखी। यहां 2 साल के अंदर ही करीब 200 बच्चे तालीम हासिल करने आने लगे, जिसमें करीब 40 बच्चे हिंदू थे।

यहां पढ़ने वाले बच्चे हिंदू और मुस्लिम दोनों परिवारों के हैं। वो यहां एक साथ बैठकर तालीम हासिल करते हैं। यही नहीं, यहां पढ़ाने वाले आधे से ज्यादा टीचर्स भी हिंदू ही हैं। ये मदरसे समाज और देश को आपसी भाईचारे का एक मुकम्मल संदेश दे रहे हैं। इतना ही नहीं, इन मदरसों में बच्चों को संस्कृत भी पढ़ाई जाती है।


गुरुवार, 23 मार्च 2017

देश भक्ति के प्रमाण पत्र मांगने वालो के लिए पैग़ाम


शुक्रवार, 17 मार्च 2017

क़ौमियत का पनघट :जामिया मिल्लिया इस्लामिया


जामिया मिल्लिया इस्लामिया अपने शुरूआती दौर से ही यकजहती कि मिसाल रहा है। इसकी स्थापना असहयोग आन्दोलन की एक कड़ी रूप में हुई.  इसका उद्देश्य राष्टीयताको बढ़ावा देकर विद्यार्थियों में वह आत्मविश्वास जगाना था जिसके बल पर वे निर्भय होकर उन क्षेत्रों में जाने का साहस कर सकें जहां दूसरे जाने से भयभीत होते हैं।  एक दूसरे के धर्म का आदर करना इसका बुनियादी उसूल रहा है ।
और जामिया को इन सब उसूलो कि प्रेरणा मिलती है ,जामिया के संस्थापकों शैख़ उल हिंद मोलाना महमूद उल हसन , मौलाना मोहम्मद अली जौहर,हुसैन अहमद मदनी, हकीम अजमल से।



हकीम अजमल खां साहब ने जामिया के बारे में कहा था कि जहां हमने एक ओर सच्चे मुसलमान पैदा करने की कोशिश की, वहीं देश सेवा की भावना भी जागृत की। यहां इस बात का ख़्याल रखा गया है कि हिन्दू छात्र इस्लामियात को जानें तथा मुस्लिम छात्र हिन्दू रीति-रिवाज से नावाकिफ़ न रहें। और ये सिलसिला अभी तक चला आ रहा है। आज भी जामिया में इस्लामियात,हिन्दू धर्म शास्त्र,  एक  एच्छिक पेपर के  रूप में अनिवार्य है.
जामिया के संस्थापक खुदसर्व धर्म समभाव  कि मिसाल रहें है। शैखुल हिन्द ने जब अंग्रेजो से लड़ाई के लिए तहरीक रेशमी रुमाल की  शुरुआत की थी तो उन्होंने अंतरिम सरकार का प्रधानमंत्री राजा महेंद्र प्रताप को बनाया.एकता और सद्भाव कि इससे बड़ी मिसाल कहाँ मिलेगी।  जामिया पहले वाइस चांसलर मौलाना मोहम्मद अली जौहर  ख़िलाफ़त आन्दोलन के नेता थे. खिलाफत आन्दोलन को  आजादी कि लड़ाई में हिन्दू मुस्लिम एकता का प्रीतक माना जाता है ।
अपने संस्थापको के इन्ही आदर्शो पर चल कर जामिया ने सद्भावना ऐसी मिसाल पेश की है जिसे देश का अन्य कोई भी विश्वविद्यालय पेश कर पाने में असमर्थ है। जामिया ने एक ही समय में उर्दू विभाग का अध्यक्ष प्रो गोपीचंद नारंग को  और हिंदी विभाग का अध्यक्ष प्रो मुजीब बैग को बना कर,साम्प्रदायिक तत्वों के उस दुष्प्रचार को नाकाम कर दिया कि उर्दू मुस्लमानो और हिन्दी हिन्दुओ की  जबान है। 
जामिया मिल्लिया इस्लामिया शांति पूर्ण ,धार्मिक सहअस्तित्व की मिसाल रहा है। जामिया ने इस्लामिक शैली अपनाने के बावजूद  हमेशा तमाम धर्मों, जैसे बौद्ध धर्म, जैन धर्म, संशयवाद, नास्तिकता को स्थान दिया है और उन्हें एक दूसरे के साथ कई तरह से प्रतिस्पर्धा करके सबको आत्मसात कर अपने आप को उस रूप में ढाला है जिसे आज सेकुलरिज्म कहा जाता है।आज हिन्दुस्तान का शायद ही कोई ऐसा सूबा हो जिसके नौजवान  तालिबिल्म (छात्र) यहाँ मौजूद न हों।’ जामिया शिक्षा, साहित्य और संस्कृति की संगम-स्थली बन चुकी है।
  धर्मनिरपेक्षता जामिया कि  विरासत का हिस्सा है और जामिया का उद्देश्य  धर्म, जाति और क्षेत्र से ऊपर उठ कर उन  वैचारिक आदर्शों पर आधारित भारत का निर्माण करना है। जिनकी परिकल्पना हमारे स्वतंत्रता सैनानियों, संस्थापको  और हमारे संविधान निर्माताओं ने की थी। 


शनिवार, 25 फ़रवरी 2017

यकजहती -वक़्त कि ज़रुरत

   
     जहरीली शहर की फिजायें  हो गई
                                         इंसानियत है सिसकती हर तरफ ,
                                         आदमी से ज्यादा गाये हो गई
हमारा हिंदुस्तान कभी यकजहती का गैह्वारा समझा जाता था। पूरी दुनिया हिन्दू मुस्लिम एकता कि दुहाई दिया करती थी
लेकिन फिर न जाने चमन को किसकी हवा लग गई कि चमन में इन्तशार फ़ैल गया। लोगों के मतभेद मन भेद में बदलने लगे।
जरा जरा सी बात लोग एक दुसरे से भिड़ने को तैयार बैठे है। वह लोग जो कल तक अंग्रेजो को काटने के लिये गाये दिया करते थे। उन्हें बकरे में भी बीफ नज़र आने लगा। वह लोग जो मजार पर कव्वालिया बजाय करते थे उन्हें संगीत में दिक्कत होने लगी।
जबकि इस देश कि परम्परा यह रही है कि बिस्मिल्लाह खान कांशी विश्वनाथ मंदिर में शहनाई बजाया करते थ। जब आजान होती थी तो मंदिर कि घंटियाँ रुक जाती थी जबकि आज,चाहे पुरे दिन बजे या न बजे लेकिन आजान के वक्त जरूर बजनी है।
ये आदर्श हमारे न थे.हमारे पूर्वजो ने हमे यह तालीम न दी थी।

गाँधीजी का मानना था कि अगर हम खुदा को सिर्फ अपने ज़ेहन से नहीं बल्कि दिल और जान से मानते हैं तो हम सम्पूर्ण मानवजाति से बगैर किसी धार्मिक, जातीय एवं वर्गीय भेदभाव के प्रेम करेंगे। मैंने कभी अपने परिचितों, अपरिचितों, देशवासियों, परदेसियों, गोरों और कालों, किसी भी धर्म के मानने वालों चाहे वे हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, पारसी, यहूदी हों, किसी के साथ भी भेदभाव नहीं किया है। मैं यह कह सकता हूँ कि मेरे भीतर इस भेदभाव को क़ायम रखने की क्षमता नहीं है।


 गाँधीजी का वास्तविक सपना दिलों को बदलना था, शक्ति से हालात को बदलकर वक़्ती फ़ायदा उठाना नहीं था। वह मानवीय समुदाय में नैतिक रूप से सन्तुलन पैदा करना चाहते थे। वह एक ऐसा हार बनाना चाहते थे जिसका हर दाना एक दूसरे से जुड़ा हुआ हो। उनका उद्देश्य था कि एक इंसान दूसरे इंसान के काम आये। वे एक दूसरे के पूरक बन जाएँ। जिसके पास जो कुछ है वह उसमें से दूसरों को भी दे ताकि सभी साधन-सम्पन्न हो जाएँ

इसलिए हमे आपस में पयार मुहब्बत में मिलजुल कर रहना चाहिए। ऐसे कामो से बचना चाहिए जो हमारी यकजहती को नुकसान पहुन्चाते होइस देश का असली मुद्दा मंदिर मस्जिद नहीं है।  इस देश का असली मुद्दा गाय नहीं है। इस देश का असली मुद्दा गरीबी है,अशिक्षा है,भूक प्यास से मर रही गाये है, अहले सियासत कि भड़की आग से जल रहा अमन का  मंदिर है। हमे गाँधी जी के आदर्शो पर चलते हुए देश कि अखंडता, को बनाये रखना होगा नहीं तो हमारा हाल यही होया कि बक़ोल  इकबाल-
न समझोगे तो मिट जाओगे ए हिन्दोस्तां वालो
तुम्हारी दास्ताँ तक भी न होगी दास्तानों में।





मतवाला: तीन राज्यों में हार, भाजपा के लिए खतरे की घंटी

मतवाला: तीन राज्यों में हार, भाजपा के लिए खतरे की घंटी : पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे सामने आ चुके हैं . कांग्रेस ने हिन्दी भाषी ...