साम्प्रदायिकता देश के लिए बड़ी चुनौती बन चुकी है। साम्प्रदायिकता से देश की स्वतंत्राता के लिए बहुत बड़ा संकट है। साम्प्रदायिकता की महामारी विकराल एवं भयावह है इसका निदान बहुत जरूरी है। इसके निदान के लिए हमें उन कारणों को खोजना चाहिए जिससे यह पैदा हुई और इसके फैलने की जो वजह हैं उन्हें रोकना चाहिए। साम्प्रदायिक तत्व अफवाहों के जरिये माहोल बिगड़ते हैं। साम्प्रदायिकता के खिलाफ धर्म निरपेक्षता एक कारगर प्रयास है इसलिए हमें धर्मनिरपेक्षता को बढावा देना चाहिए। साम्प्रदायिकतावाद परम्परावाद की जड़ से निकलता है। परम्पराओं के मोह ने साम्प्रदायिकता को जन्म दिया है। हालाँकि यह बात सही है कि परम्परा में ऐसे जीवन तत्व भी हैं जो सामाजिक चेतना के अंग हैं पर इन परम्पराओं को इतना स्वार्थपरक बना दिया गया है कि इनसे अहित अधिक होता है और हित कम। इसलिए परम्परा का पीछा करना अब औचित्यहीन रह गया है।
साम्प्रदायिकता से देश विभाजन का खतरा है। साम्प्रदायिकता के जहर ने सम्पूर्ण देश को विषाक्त बना डाला है। हमें यह जानना बहुत आवश्यक है कि वे कौन सी परिस्थितियां हैं जिससे साम्प्रदायिकता का विषवृक्ष पल्लवित हुआ। हमें इन परिस्थितियों के अध्ययन के बाद उन्हीं संदर्भों में इसका निदान खोजना चाहिए।
यह सच है कि यहां में मुगलों से पूर्व शक, हूण, कुशान के आक्रांता आये थे जिन्होंने देश के धन को भरपूर लूटा, सामूहिक कत्लेआम किये और स्त्री-पुरुषों को दास दासियां बना कर ले गये जहां उनमें से पुरुष का मूल्य 5 रुपया और स्त्री का मूल्य 10 रुपया लगा कर चौराहों पर नीलाम कर दिया गया। ये आक्रांता आये और चले गये थे। जब मुगल भारत में आये तो वे वापस नहीं गये। यह घोर निकृष्ट सोच है कि भारत का हिन्दू शक और हूणों को विदेशी और आक्रांता नहीं कहता है और न आर्यों को ही जिन्होंने 60 हजार अनार्यों का कत्लेआम किया था। शक, हूण, कुषान तीनों ही बाहरी हत्यारे आक्रांता थे पर वे भारत में बस गये। इन आक्रांताओं और मुगलों में क्या अंतर है फिर मुगलों को आक्रांता कहना कितनी बेइमानी की बात है। सच बात तो यह है कि मुगलों ने तो कोई कत्लेआम भी नहीं किया। अकबर ने तो सर्वधर्म समभाव की भावना से प्रेरित होकर दीन ए इलाही चलाया था। औरंगजेब जिस प्रकार बदनाम किया जाता है वह घृणा भाव के कारण बदनाम किया जाता है वरना अनेक हिन्दू उसके दरबार में उच्च पदों पर थे। अनेक मंदिरों के लिए उसने शाही खजाने से धन दिया था। उसे 'जजिया कर' के लिए बदनाम किया जाता है पर जजिया तो उसने मुसलमानों पर भी लगाया था। औरंगजेब ने कोई मंदिर नहीं तुड़वाया बल्कि अनेक उदाहरण ऐसे भी मिल जायेंगे जहां स्वयं हिन्दू राजाओं द्वारा मंदिरों को ध्वस्त कराया गया था। कश्मीर के राजा हर्ष ने तो अनेक मूर्तियों को तुड़वाया था। मौर्य शासकों ने तो तमाम हिन्दू मूर्तियों को पिघला कर सिक्कों के लिए धातु इकट्ठी करायी थी।
खोजने पर नये तथ्य प्रकट हुए हैं कि भारत का इतिहास अंग्रेजों ने कम और हिन्दू लेखकों ने अधिक झूठे तथ्य घुसेड़ कर साम्प्रदायिक बनाया है और मुसलमानों के प्रति विषवमन किया है। विशम्भर नाथ पांडे पूर्व राज्यपाल उड़ीसा ने लिखा कि वे जब टीपू सुल्तान पर शोध कर रहे थे तो एक छात्रा के पास पुस्तक देखी, जिसमें लिखा था कि टीपू सुल्तान ने तीन हजार ब्राह्मणों को बलात इस्लाम धर्म कुबूल करने को विवश किया था और तीन हजार ब्राह्मणों ने आत्महत्या कर ली थी। यह लेख एक हिन्दू लेखक पंडित हरप्रसाद शास्त्री का लिखा हुआ था। विशम्भर दयाल पांडे ने पं. हर प्रसाद से लिख कर पूछा कि यह कहां पर लिखा है तो हर प्रसाद ने कहा कि यह मैसूर के गजट में लिखा है पर गजट देखा गया, तो गजट में यह तथ्य कहीं नहीं पाया गया। इस प्रकार हिन्दू लेखकों ने मुसलमान बादशाहों के बारे में वैमनश्यतावश बहुत कुछ झूठ लिखा है। यही औरंगजेब के बारे में भी है। टीपू के बारे में तो यह प्रसिद्ध है कि उसका सेनापति ब्राह्मण था, वह 150 मंदिरों को प्रतिवर्ष अनुदान देता था, और श्रृंगेरी के जगतगुरु को बहुत मान्यता देता था। इससे साबित होता है कि इतिहास जानबूझ कर अंग्रेज लेखकों ने नहीं हिन्दू लेखकों ने ही झूठ लिखा है।
स्वतंत्रता के बाद यह सोचा गया था कि अब इस प्रकार का वातावरण तैयार किया जायगा जिससे देश में साम्प्रदायिकता की आग को ठंडा किया जायगा, किन्तु दुर्भाग्य है कि भारत की सरकार ने पिछले 60 साल में साम्प्रदायिक सौहार्द को बनाने के बजाय इसकी खाई को अधिक चौड़ा ही किया है। संविधान में भी स्पष्ट लिखा गया है कि किसी भी धार्मिक संगठन को सांस्कृतिक और शैक्षणिक कार्यों के अतिरिक्त किसी भी प्रकार साम्प्रदायिकता उभारने की अनुमति नहीं दी जायगी। पर हम बराबर देख रहे हैं कि साम्प्रदायिकता बराबर उभारी गयी है और संविधान को भी ताक में रख दिया गया है। कांग्रेस ने सत्ता में रहते हुए भी केरल और पंजाब में खूब धार्मिक नाटक खेले। आज तो धर्म के नाम पर ही नेतागीरी चमक रही है। धर्म के नाम पर राजनैतिक नेता यात्रायें निकाल रहे हैं। आज विभिन्न धार्मिक सम्प्रदायों में कटुता पैदा करके राजनीति चलायी जा रही है। अतः आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीति के हर नापाक गठबंधन को रोका जाय। साम्प्रदायिकता राष्ट्र प्रजातंत्रा और समाज की दुश्मन है इससे बचा जाय। धर्म की राजनीति करने वाले चाहे वे व्यक्ति हों, चाहे संगठन इन पर रोक लगायी जाय और इनका दमन किया जाय।
आजादी कि जंग लड़ी है ,हिन्दू
मुस्लिम दोनों ने
अपने मुल्क को खून दिया है,हिन्दू मुस्लिम दोनों ने
इस धरती पर जन्म लिया है,हिन्दू मुस्लिम दोनों ने
दोनों मिल कर देश बचाओ,सबका हिंदुस्तान है






